Tuesday, May 14, 2019

मैं रोज़ ईमान जलाता हूँ


 
जब मैं ईमानदार होता था
ईमान को सर पर ढोता था
ईमान की गठरी भरती जाती
फिर उसमे दबकर रोता था
जो बेईमानों में बसता था
वो अक्सर मुझपर हँसता था
ईमान ही थोड़ा महंगा था
इंसान तो मैं भी सस्ता था
सोचा था की कर्म करूँगा
फिर थोड़ा मैं धर्म करूँगा
धर्म कर्म का काण्ड हो गया
अब मैं थोड़ा भाण्ड हो गया
खुद्दारी की झीनी चादर में
अक्सर ठण्ड लग जाती थी
अब सर्दी से बच जाता हूँ
मैं रोज़ ईमान जलाता हूँ

~संगीता 




Monday, April 22, 2019

बचपन की वो यादें






बचपन की वो यादें

कैसे लिख पाऊँगी मैं

लिखते लिखते कहीं

बचपन में खो जाउंगी मैं


उन खेतों में, उन बगीचों में

उन संतरों के बाग़ में

गाते थे नीम के पेड़ पर

जब गीत बेसुरी राग में

दादी आती सुनकर शोर

भागते थे सब जाने किस ओर

किसको परवाह धुप छांव की

हम थी सेना उस गाँव की


मधुमक्खियों और ततैयों के

छत्ते तोडा करते थे

कभी तितलियों कभी बिल्लियों के

पीछे दौड़ा करते थे

और लोगों की छत पर जाकर

मटके फोड़ा करते थे

शैतान थे इतने मत पूछिए

हम किसको छोड़ा करते थे


बारिश की गीली मिट्टी में

एक घर कभी बनाते थे

नीम की डाली से फिर

उस घर में पेड़ लगाते थे

फिर किसी को मेहमान बनाकर

खाने पर बुलाते थे

वो फिर फूलों का शृंगार कर

कूदते हुए घर आते थे

मिट्टी के लड्डू, पत्तों के बिस्कुट

निम्बोलियों के आम बनाते थे


कभी हाथ जब आते पैसे

फिर हम देखो खर्चें कैसे

छोटी सी दुकान थी इक वो

जिस पर हम जाया करते थे

सोते हुए उस अंकल को

चिल्ला कर जगाया करते थे

अठ्ठनी रुपया मिला मिला कर

इमली लाया करते थे


गाँव के बीचों बीच कहीं

इक मंदिर था इक चौका था

छुप्पन छुपाई खेला करते

हमको किसने रोका था

दूर एक बरगद के पेड़ के

पास कभी नहीं जाते थे

सुना था हमने आधी रात को

भूत वहाँ पर आते थे


फिर दादी की गोद में सर रख

कहानी सुना करते थे

जितनी सिमित थी दुनिया अपनी

उतने ही सपने बुना करते थे


~संगीता

Sunday, April 7, 2019

हौंसला बुलंद कर

तोड़ दे ज़ंज़ीर को
तू हौंसला बुलंद कर

वो देख तेरा लक्ष्य है
तू सिर्फ उसको देख कर
अर्जुन के जैसा वार कर
तू आज आँखें बंद कर

तू जीते जी महान हो
मरकर भी हो तू अमर
बन किसी की प्रेरणा
तू ऐसा कोई काम कर

तू उठ ज़रा ज़मीन से
जा छुले आसमान को
कर वक़्त तेरे हाथ में
कर साथ में भगवान् को

जग तोड़ता है हौंसला
क्यूं  ढूंढ़ता यहां वहाँ
तेरे अंदर ही कहीं छुपा
तेरे हौंसलों का कारवाँ

~संगीता 

Sunday, March 24, 2019

और कुछ भी नहीं




मैं, मेरा कल, मेरा आज, मेरा कल और कुछ भी नहीं


एक धोखा एक द्वंद हर पल और कुछ भी नहीं


मैं चलुं और चलती रहुँ युंही अटल और कुछ भी नहीं


मैं रोकुं या रूक जाऊँ यहीं निश्चल और कुछ भी नहीं


कभी क्रंदन रूदन कभी पलकों का जल और कुछ भी नहीं


जिंदगी सुरों भरा गीत या गज़ल और कुछ भी नहीं


कभी उड़ता गगन में मन चंचल और कुछ भी नहीं


कभी आसमानों से गिरता धरातल और कुछ भी नहीं


कभी युं ही रूलता फिरता दिल पागल और कुछ भी नहीं


कभी दिल में उठती लहरों की खलबल और कुछ भी नहीं


कभी खिंच ले जाता दर्द भरा दलदल और कुछ भी नहीं


कभी प्रेम की बारिशों में भिगाता हुआ बादल और कुछ भी नहीं


मैं, मेरा कल, मेरा आज, मेरा कल और कुछ भी नहीं !!


~संगीता

Thursday, March 7, 2019

नदिया




बहती रहूँ  मैं, फिसलती रहूँ
कभी पत्थरों से भी निकलती रहूँ 

बिखरती रहूँ मैं, संभलती रहूँ
मैं बारिशों की आस में पलती रहूँ 

पिघलती रहूँ मैं, घुलती रहूँ
जिस रूप में चाहो मैं ढलती रहूँ  

कभी तृषा कभी अग्नि बुझाऊँ
कभी राख भी मैं ही निगलती रहूँ  

कण कण घुल कर जीवन दूँ
और अपना ही जीवन बदलती रहूँ  

हे नारी ! मैं नदिया हूँ,
मैं तू नहीं, जो चलती रहूँ  !!

-संगीता



Sunday, February 24, 2019

और सुबह हो गयी



एक ख्याल भर आने की देर है 
नींद तुझमें और मुझमें फासले आ जाते हैं
अभी अभी मिलने आयी थी
चुप सी शर्मायी सी 
खामोशियों भरी गहरायी सी 
नींद अभी अभी तो तू आयी थी 
बस मिल ना पायी....
एक ख्याल ने भी दस्तक दी थी
अभी अभी शोर सा था 
ऐसे आया मानों चोर सा था 
भाग रहा चारों ओर सा था
मैं पकड़ने लगी पर मिल ना पायी 
ना ख्याल से ना तुझसे 
और फासले आते गए
कुछ ख्याल से कुछ तुझसे
और नींद तू जाने लगी थी
पर ख्याल ने रुकना चाहा
मुझसे तो पूछ लेती
किसको रखूं तुझको या ख्याल को 
तूने पूछा नहीं और तू चली गयी
ख्याल रुक गया और सुबह हो गयी !!

~संगीता 

Sunday, February 10, 2019

जिद्दी से हम आज भी



इसी तैश में लोग सड़ते गए,
वो पत्थर फेंकते गए, हम आगे बढ़ते गए !

वो जिद्दी कह कह कर, करते रहे ज़माने भर की तौहीन,
हम फिर भी अपनी बात पर अड़ते गए !

क़ीमत ना समझी अपनों ने अपनों की,
कुछ इस तरह ही रिश्ते बिगड़ते गए !

जज़्बात और हालात की आँधियों में,
दिलों के शहर उजड़ते गए !

मिले बहुत हमराह फिर तन्हा राह में,
हम उन मोतियों को माला में जड़ते गए !

जिद्दी से हम आज भी उस राह पर,
हाथ में माला लिए, बढ़ते गए, बस बढ़ते गए !

~संगीता

Saturday, January 26, 2019

जीने की आरज़ू




मेरे घर की भी हालत मेरे हालात सी रही
मैं भी बिखरता गया, वो भी बिखरती गयी !

ज़र्जर थी घर की दीवारें मेरी ही तरह
मैं भी गिरता गया, वो भी गिरती गयी !

मेरी ऊंचाइयों के साथ साथ बढ़ती थी सीढ़ियां
वक़्त के साथ साथ वो भी उतरती गयी !

कमरे जो थे हसरतों से खाली थे
हसरतें जो थीं, खाली कमरों से भरती गयी !

ज़िन्दगी में कैद तसवीरें थी, या तस्वीरों में कैद ज़िन्दगी
यादों के कैदखाने में वो भी ठहरती गयी !

कट कट करता पंखा भी अब थकने लगा था
शायद उसकी भी जीने की आरज़ू मरती गयी !

~संगीता



Sunday, January 6, 2019

लक्ष्य


उन पर्वतों की पीठ पर,
है एक दरिया बह रहा !

वो दरिया एक अश्क़ है,
जो पर्वतों से कह रहा !

मैं बह रहा हूँ पास से,
है तू यहीं खड़ा हुआ !

है मुझ में कितना वेग देख,
तू बेचैत सा पड़ा हुआ !

तब बोला पर्वत शान से,
कमज़ोर था तू बह गया !

मैं हूँ अड़िग लक्ष्य पे,
मैं बस उसी पे रह गया !

~संगीता 

Monday, December 24, 2018

आज से हवा का बिल भरना


सुनो तुम ! जो किश्तों में जिंदगी चला रहे हो
किश्तों में घर, किश्तों में गाडी
और गाडी में गर्लफ्रेंड घुमा रहे हो
गाडी के तेल का बिल भर रहे हो
फिर धुंए से हवा में प्रदुषण कर रहे हो
आज से हवा का बिल भरना !

सुनो तुम ! जो जिंदगी को धुंए में फूंक रहे हो
एक के बाद एक सिगरेट के छल्ले बना रहे हो
अपने फेफड़ो में कैंसर को जमा रहे हो
और दूसरों को अस्थमा से मरवा रहे हो
अपनी और दूसरों की जान हवा में उड़ा रहे हो
आज से हवा का बिल भरना !

सुनो तुम!जो जिंदगी की तपिश में खुदको तपा रहे हो
कभी खेत कभी जंगलों को जला रहे हो
ऑक्सीज़न की मात्रा दर दर घटा रहे हो
ब्लैक होल का घेरा तर तर बढ़ा रहे हो
उसी ब्लैक होल में हम सबको पहुंचा रहे हो
आज से हवा का बिल भरना !

सुनो तुम ! जो जिंदगी को फ़ैक्टरियों में गवां रहे हो
फ़ैक्टरियों को बीच बाजार लगा रहे हो
फिर धुंए का गुब्बार उड़ा रहे हो
सारी हवा में ज़हर फैला रहे हो
दूसरों की जान के पैसे कमा रहे हो
आज से हवा का बिल भरना !

~संगीता

Sunday, December 2, 2018

विचलित मन की व्यथा



तू कलकल करती नदिया सी,
मैं झरने जैसा उत्पाती !
मेरे विचलित मन की व्यथा को,
तू कैसे शांत कर जाती !

मेरी अविरत गिरती धारा को,
अपने आग़ोश तू भर जाती !
मैं गिरकर तपता निर्जल सा,
फिर से पानी तू कर जाती !  


मुझ पानी को फिर पानी तू,
अपने संग लेकर तर जाती !
मेरे संग संग बहकर नदिया तू,
मुझको भी नदिया कर जाती !

~संगीता




Monday, November 26, 2018

कच्ची मिट्टी से बना मैं





मैं, मैं नहीं कोई और हूँ
ऐसा लगता रहा मुझे
तब से जब से मैं, मैं हूँ
तब से जब से मैं, मैं नहीं !
कभी माँ सा, कभी पिता सा
कभी बहिन, कभी भाई सा
कभी दादा सा कभी नाना सा
और कभी पूरा उनसा भी नहीं !
नाक दादा सी, कान नाना से
सगे सम्बन्धी हर किसी सा
खाता, पीता, हँसता, खेलता
हर हरकत में कोई और सा !
अपना कुछ भी नहीं
ना आचार, ना विचार
ना सोच, ना समझ
जिस संगत रहा, उनसा बना !
याद होगा वो दिन जब मिले थे हम
उस दिन मैं, तुमसा बना
कच्ची मिट्टी ही रहा ताउम्र
जिस रूप ढाला, उस रूप ढला !
आज आखिरी दिन था ....
सब देख रहे थे मुझे ले जाते हुए..
आज मैं, फिर मैं हूँ,
और मैं ही तो  नहीं हूँ
शुक्र है, किसी ने जाते जाते कह ही दिया
कि मैं, मैं ही था,
किसी और सा नहीं, खुद सा
कमियां थीं तो मेरी थी
गुण थे तो मेरे थे ...
आह!..बस यही सुनना बाकी था
आज गहरी नींद ले रहा था मैं....
आत्मा एक पल के लिए ठहरने लगी थी
सोचा थोड़ा और जी लूँ
फिर सोचा, चलते हैं
उम्रभर किसी और से रहे
आज खुद से ही मिलते हैं
कच्ची मिट्टी बना फिर से मैं
चलो! कच्ची मिट्टी में ही मिलते हैं


~संगीता