जब मैं ईमानदार होता था
ईमान को सर पर ढोता था
ईमान की गठरी भरती जाती
फिर उसमे दबकर रोता था
जो बेईमानों में बसता था
वो अक्सर मुझपर हँसता था
ईमान ही थोड़ा महंगा था
इंसान तो मैं भी सस्ता था
सोचा था की कर्म करूँगा
फिर थोड़ा मैं धर्म करूँगा
धर्म कर्म का काण्ड हो गया
अब मैं थोड़ा भाण्ड हो गया
खुद्दारी की झीनी चादर में
अक्सर ठण्ड लग जाती थी
अब सर्दी से बच जाता हूँ
मैं रोज़ ईमान जलाता हूँ
ईमान को सर पर ढोता था
ईमान की गठरी भरती जाती
फिर उसमे दबकर रोता था
जो बेईमानों में बसता था
वो अक्सर मुझपर हँसता था
ईमान ही थोड़ा महंगा था
इंसान तो मैं भी सस्ता था
सोचा था की कर्म करूँगा
फिर थोड़ा मैं धर्म करूँगा
धर्म कर्म का काण्ड हो गया
अब मैं थोड़ा भाण्ड हो गया
खुद्दारी की झीनी चादर में
अक्सर ठण्ड लग जाती थी
अब सर्दी से बच जाता हूँ
मैं रोज़ ईमान जलाता हूँ
~संगीता








