Monday, December 24, 2018

आज से हवा का बिल भरना


सुनो तुम ! जो किश्तों में जिंदगी चला रहे हो
किश्तों में घर, किश्तों में गाडी
और गाडी में गर्लफ्रेंड घुमा रहे हो
गाडी के तेल का बिल भर रहे हो
फिर धुंए से हवा में प्रदुषण कर रहे हो
आज से हवा का बिल भरना !

सुनो तुम ! जो जिंदगी को धुंए में फूंक रहे हो
एक के बाद एक सिगरेट के छल्ले बना रहे हो
अपने फेफड़ो में कैंसर को जमा रहे हो
और दूसरों को अस्थमा से मरवा रहे हो
अपनी और दूसरों की जान हवा में उड़ा रहे हो
आज से हवा का बिल भरना !

सुनो तुम!जो जिंदगी की तपिश में खुदको तपा रहे हो
कभी खेत कभी जंगलों को जला रहे हो
ऑक्सीज़न की मात्रा दर दर घटा रहे हो
ब्लैक होल का घेरा तर तर बढ़ा रहे हो
उसी ब्लैक होल में हम सबको पहुंचा रहे हो
आज से हवा का बिल भरना !

सुनो तुम ! जो जिंदगी को फ़ैक्टरियों में गवां रहे हो
फ़ैक्टरियों को बीच बाजार लगा रहे हो
फिर धुंए का गुब्बार उड़ा रहे हो
सारी हवा में ज़हर फैला रहे हो
दूसरों की जान के पैसे कमा रहे हो
आज से हवा का बिल भरना !

~संगीता

Sunday, December 2, 2018

विचलित मन की व्यथा



तू कलकल करती नदिया सी,
मैं झरने जैसा उत्पाती !
मेरे विचलित मन की व्यथा को,
तू कैसे शांत कर जाती !

मेरी अविरत गिरती धारा को,
अपने आग़ोश तू भर जाती !
मैं गिरकर तपता निर्जल सा,
फिर से पानी तू कर जाती !  


मुझ पानी को फिर पानी तू,
अपने संग लेकर तर जाती !
मेरे संग संग बहकर नदिया तू,
मुझको भी नदिया कर जाती !

~संगीता




Monday, November 26, 2018

कच्ची मिट्टी से बना मैं





मैं, मैं नहीं कोई और हूँ
ऐसा लगता रहा मुझे
तब से जब से मैं, मैं हूँ
तब से जब से मैं, मैं नहीं !
कभी माँ सा, कभी पिता सा
कभी बहिन, कभी भाई सा
कभी दादा सा कभी नाना सा
और कभी पूरा उनसा भी नहीं !
नाक दादा सी, कान नाना से
सगे सम्बन्धी हर किसी सा
खाता, पीता, हँसता, खेलता
हर हरकत में कोई और सा !
अपना कुछ भी नहीं
ना आचार, ना विचार
ना सोच, ना समझ
जिस संगत रहा, उनसा बना !
याद होगा वो दिन जब मिले थे हम
उस दिन मैं, तुमसा बना
कच्ची मिट्टी ही रहा ताउम्र
जिस रूप ढाला, उस रूप ढला !
आज आखिरी दिन था ....
सब देख रहे थे मुझे ले जाते हुए..
आज मैं, फिर मैं हूँ,
और मैं ही तो  नहीं हूँ
शुक्र है, किसी ने जाते जाते कह ही दिया
कि मैं, मैं ही था,
किसी और सा नहीं, खुद सा
कमियां थीं तो मेरी थी
गुण थे तो मेरे थे ...
आह!..बस यही सुनना बाकी था
आज गहरी नींद ले रहा था मैं....
आत्मा एक पल के लिए ठहरने लगी थी
सोचा थोड़ा और जी लूँ
फिर सोचा, चलते हैं
उम्रभर किसी और से रहे
आज खुद से ही मिलते हैं
कच्ची मिट्टी बना फिर से मैं
चलो! कच्ची मिट्टी में ही मिलते हैं


~संगीता