मैं, मैं नहीं कोई और हूँ
ऐसा लगता रहा मुझे
तब से जब से मैं, मैं हूँ
तब से जब से मैं, मैं नहीं !
कभी माँ सा, कभी पिता सा
कभी बहिन, कभी भाई सा
कभी दादा सा कभी नाना सा
और कभी पूरा उनसा भी नहीं !
नाक दादा सी, कान नाना से
सगे सम्बन्धी हर किसी सा
खाता, पीता, हँसता, खेलता
हर हरकत में कोई और सा !
अपना कुछ भी नहीं
ना आचार, ना विचार
ना सोच, ना समझ
जिस संगत रहा, उनसा बना !
याद होगा वो दिन जब मिले थे हम
उस दिन मैं, तुमसा बना
कच्ची मिट्टी ही रहा ताउम्र
जिस रूप ढाला, उस रूप ढला !
आज आखिरी दिन था ....
सब देख रहे थे मुझे ले जाते हुए..
आज मैं, फिर मैं हूँ,
और मैं ही तो नहीं हूँ
शुक्र है, किसी ने जाते जाते कह ही दिया
कि मैं, मैं ही था,
किसी और सा नहीं, खुद सा
कमियां थीं तो मेरी थी
गुण थे तो मेरे थे ...
आह!..बस यही सुनना बाकी था
आज गहरी नींद ले रहा था मैं....
आत्मा एक पल के लिए ठहरने लगी थी
सोचा थोड़ा और जी लूँ
फिर सोचा, चलते हैं
उम्रभर किसी और से रहे
आज खुद से ही मिलते हैं
कच्ची मिट्टी बना फिर से मैं
चलो! कच्ची मिट्टी में ही मिलते हैं
~संगीता
