Monday, April 22, 2019

बचपन की वो यादें






बचपन की वो यादें

कैसे लिख पाऊँगी मैं

लिखते लिखते कहीं

बचपन में खो जाउंगी मैं


उन खेतों में, उन बगीचों में

उन संतरों के बाग़ में

गाते थे नीम के पेड़ पर

जब गीत बेसुरी राग में

दादी आती सुनकर शोर

भागते थे सब जाने किस ओर

किसको परवाह धुप छांव की

हम थी सेना उस गाँव की


मधुमक्खियों और ततैयों के

छत्ते तोडा करते थे

कभी तितलियों कभी बिल्लियों के

पीछे दौड़ा करते थे

और लोगों की छत पर जाकर

मटके फोड़ा करते थे

शैतान थे इतने मत पूछिए

हम किसको छोड़ा करते थे


बारिश की गीली मिट्टी में

एक घर कभी बनाते थे

नीम की डाली से फिर

उस घर में पेड़ लगाते थे

फिर किसी को मेहमान बनाकर

खाने पर बुलाते थे

वो फिर फूलों का शृंगार कर

कूदते हुए घर आते थे

मिट्टी के लड्डू, पत्तों के बिस्कुट

निम्बोलियों के आम बनाते थे


कभी हाथ जब आते पैसे

फिर हम देखो खर्चें कैसे

छोटी सी दुकान थी इक वो

जिस पर हम जाया करते थे

सोते हुए उस अंकल को

चिल्ला कर जगाया करते थे

अठ्ठनी रुपया मिला मिला कर

इमली लाया करते थे


गाँव के बीचों बीच कहीं

इक मंदिर था इक चौका था

छुप्पन छुपाई खेला करते

हमको किसने रोका था

दूर एक बरगद के पेड़ के

पास कभी नहीं जाते थे

सुना था हमने आधी रात को

भूत वहाँ पर आते थे


फिर दादी की गोद में सर रख

कहानी सुना करते थे

जितनी सिमित थी दुनिया अपनी

उतने ही सपने बुना करते थे


~संगीता

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