Sunday, December 2, 2018

विचलित मन की व्यथा



तू कलकल करती नदिया सी,
मैं झरने जैसा उत्पाती !
मेरे विचलित मन की व्यथा को,
तू कैसे शांत कर जाती !

मेरी अविरत गिरती धारा को,
अपने आग़ोश तू भर जाती !
मैं गिरकर तपता निर्जल सा,
फिर से पानी तू कर जाती !  


मुझ पानी को फिर पानी तू,
अपने संग लेकर तर जाती !
मेरे संग संग बहकर नदिया तू,
मुझको भी नदिया कर जाती !

~संगीता




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