इसी तैश में लोग सड़ते गए,
वो पत्थर फेंकते गए, हम आगे बढ़ते गए !
वो जिद्दी कह कह कर, करते रहे ज़माने भर की तौहीन,
हम फिर भी अपनी बात पर अड़ते गए !
क़ीमत ना समझी अपनों ने अपनों की,
कुछ इस तरह ही रिश्ते बिगड़ते गए !
जज़्बात और हालात की आँधियों में,
दिलों के शहर उजड़ते गए !
मिले बहुत हमराह फिर तन्हा राह में,
हम उन मोतियों को माला में जड़ते गए !
जिद्दी से हम आज भी उस राह पर,
हाथ में माला लिए, बढ़ते गए, बस बढ़ते गए !
~संगीता

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