बहती रहूँ मैं, फिसलती रहूँ
कभी पत्थरों से भी निकलती रहूँ
बिखरती रहूँ मैं, संभलती रहूँ
मैं बारिशों की आस में पलती रहूँ
पिघलती रहूँ मैं, घुलती रहूँ
जिस रूप में चाहो मैं ढलती रहूँ
कभी तृषा कभी अग्नि बुझाऊँ
कभी राख भी मैं ही निगलती रहूँ
कण कण घुल कर जीवन दूँ
और अपना ही जीवन बदलती रहूँ
हे नारी ! मैं नदिया हूँ,
मैं तू नहीं, जो चलती रहूँ !!
-संगीता

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