मेरे घर की भी हालत मेरे हालात सी रही
मैं भी बिखरता गया, वो भी बिखरती गयी !
ज़र्जर थी घर की दीवारें मेरी ही तरह
मैं भी गिरता गया, वो भी गिरती गयी !
मेरी ऊंचाइयों के साथ साथ बढ़ती थी सीढ़ियां
वक़्त के साथ साथ वो भी उतरती गयी !
कमरे जो थे हसरतों से खाली थे
हसरतें जो थीं, खाली कमरों से भरती गयी !
ज़िन्दगी में कैद तसवीरें थी, या तस्वीरों में कैद ज़िन्दगी
यादों के कैदखाने में वो भी ठहरती गयी !
कट कट करता पंखा भी अब थकने लगा था
शायद उसकी भी जीने की आरज़ू मरती गयी !
~संगीता

