Saturday, January 26, 2019

जीने की आरज़ू




मेरे घर की भी हालत मेरे हालात सी रही
मैं भी बिखरता गया, वो भी बिखरती गयी !

ज़र्जर थी घर की दीवारें मेरी ही तरह
मैं भी गिरता गया, वो भी गिरती गयी !

मेरी ऊंचाइयों के साथ साथ बढ़ती थी सीढ़ियां
वक़्त के साथ साथ वो भी उतरती गयी !

कमरे जो थे हसरतों से खाली थे
हसरतें जो थीं, खाली कमरों से भरती गयी !

ज़िन्दगी में कैद तसवीरें थी, या तस्वीरों में कैद ज़िन्दगी
यादों के कैदखाने में वो भी ठहरती गयी !

कट कट करता पंखा भी अब थकने लगा था
शायद उसकी भी जीने की आरज़ू मरती गयी !

~संगीता



Sunday, January 6, 2019

लक्ष्य


उन पर्वतों की पीठ पर,
है एक दरिया बह रहा !

वो दरिया एक अश्क़ है,
जो पर्वतों से कह रहा !

मैं बह रहा हूँ पास से,
है तू यहीं खड़ा हुआ !

है मुझ में कितना वेग देख,
तू बेचैत सा पड़ा हुआ !

तब बोला पर्वत शान से,
कमज़ोर था तू बह गया !

मैं हूँ अड़िग लक्ष्य पे,
मैं बस उसी पे रह गया !

~संगीता