लक्ष्य
उन पर्वतों की पीठ पर,
है एक दरिया बह रहा !
वो दरिया एक अश्क़ है,
जो पर्वतों से कह रहा !
मैं बह रहा हूँ पास से,
है तू यहीं खड़ा हुआ !
है मुझ में कितना वेग देख,
तू बेचैत सा पड़ा हुआ !
तब बोला पर्वत शान से,
कमज़ोर था तू बह गया !
मैं हूँ अड़िग लक्ष्य पे,
मैं बस उसी पे रह गया !
~संगीता
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